बैल रखना है तो लेना होगा लाइसेंस! सड़क पर 10 रुपये से ज्यादा मिले, सरकार को नहीं बताया तो होगी जेल! ऐसे-ऐसे भी अटपटे कानून!

अंग्रेजों के जमाने से ही बहुत सारे कानून चले आ रहे हैं, जिनकी प्रासंगिकता अब खत्म हो गई है. ऐसे 2-4-10 नहीं बल्कि सैकड़ों ऐसे कानून हैं, जिनका अब कोई मतलब ही नहीं रह गया है.

देश में कानून की शुरुआत 1861 में हुई है. पहली बार जब कानून बना, तब यहां अंग्रेजों का शासन था. ब्रिटिश इंडिया में ही आईपीसी (IPC) यानी भारतीय आचार संहिता (Indian Penal Code) तैयार की गई. किसी भी तरह की आपराधिक घटना में आईपीसी की धाराओं के तहत ही रिपोर्ट दर्ज की जाती है और अपराध साबित होने पर उसी आधार पर जज सजा सुनाते हैं.

अंग्रेज के जमाने से ही बहुत सारे कानून चले आ रहे हैं, जिनकी प्रासंगिकता अब खत्म हो गई है. कानून मंत्रालय की ओर से 7 साल में 1500 से भी अधिक ऐसे कानूनों को खत्म कर दिया गया है. अब ट्रेजर ट्रोव एक्ट को ही ले लीजिए, यह कानून कहता है कि 10 रुपये से अधिक मूल्य का कोई सामान आपको सड़क पर दिखता है, तो इसकी जानकारी सरकार को देनी होगी. अन्यथा आपको 1 साल की जेल हो सकती है

ऐसे 2-4-10 नहीं बल्कि सैकड़ों ऐसे कानून हैं, जिनका अब कोई मतलब ही नहीं रह गया है. कानून मंत्रालय की ओर से ऐसे कानूनों की समीक्षा की जाती है और फिर उन्हें खत्म किया जाता है. दिल्ली की एक थिंक टैंक सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी (CCS) की तरफ से ऐसे अप्रासंगिक कानूनों को लेकर एक वृहद स्टडी की गई है. CCS में एसोसिएट ​डायरेक्टर अविनाश चंद्र ने TV9 Hindi को बताया कि सीसीएस के सुझाव पर कई कानून खत्म भी किए गए हैं. आइए कुछ अटपटे कानूनों के बारे में जानते हैं.

बैल रखने के लिए लाइसेंस, फिर कैंसिल का भी प्रावधान

कर्नाटक लाइवस्टॉक इम्प्रूवमेंट एक्ट (Karnataka Livestock Improvement Act) 1961: इस कानून के तहत आपको बैल रखने के लिए भी लाइसेंस लेना अनिवार्य है. यही नहीं अगर बैल नपुंसक निकला यानी अगर वह अपनी नस्ल को आगे बढ़ाने लायक नहीं है तो सरकार को उस बैल का लाइसेंस कैंसिल करने का अधिकार है.

संथाल परगना एक्ट (Sathal pargana Act) 1855: संथाल परगना झारखंड की एक कमिश्नरी है, जिसमें छह जिले गोड्डा, देवघर, दुमका, जामताड़ा, साहिबगंज और पाकुड़ आते हैं. दुमका में इसका मुख्यालय है. संथाल आदिवासियों का एक समुदाय है और परगना मतलब प्रांत होता है. ब्रिटिश इंडिया में यह क्षेत्र संयुक्त बिहार का हिस्सा था. ब्रिटिश प्रशासन द्वारा बनाए गए इस कानून का उद्देश्य आदिवासियों को अलग-थलग कर उनकी आबादी को रोकना था. आजाद भारत में इसका न तो कभी इस्तेमाल हुआ और न ही जरूरत रह गई है.

सड़क पर पैसे मिले, सूचना नहीं दी तो जेल

ट्रेजर ट्रोव एक्ट (Treasure Trove Act) 1878: यह कानून तो बेहद अजीब ही लगता है. आप भी सोचेंगे आखिर ऐसा कानून क्यों बनाया गया. इस कानून के तहत अगर किसी नागरिक को 10 रुपये से अधिक कीमत का कोई सामान/पैसे/खजाना मिलता है तो उसे इसकी सूचना सरकार को देनी होगी. ऐसा न करने पर एक साल तक की कैद हो सकती है. ऐसे कानून को कोई मतलब नहीं बनता है.

3500 रुपये से कम.. किराया कंट्रोल के लिए एक्ट

द दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट (The Delhi Rate Control Act) 1958: दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में लागू इस कानून को मकान या दुकान का किराया तय करने, संतुलन बनाए रखने, किराएदारों को जबरन निकालने से रोकने वगैरह के उद्देश्य के लिए बनाया गया था. हालांकि यह सरकारी प्रापर्टी, स्लम और 3,500 रुपये से ऊपर किराए वाले मामलों में लागू नहीं होता है. अब इसकी प्रासंगिकता नहीं रह गई है. अब तो सरकार मॉडल टेनेंसी एक्ट ला चुकी है.

तांबे का तार रखने पर भी 5 साल की जेल!

टेलीग्राफ वायर्स एक्ट के तहत टेलीग्राफ तार बेचने या 10 पाउंड से ज्यादा वजन के तांबे के तार पास रखना कानूनन जुर्म है. इस एक्ट के तहत 5 साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है. कई वर्षों से यह कानून भी प्रासंगिक नहीं रहा.

कई और भी ऐसे कानून

145 साल पुराना कानून द सराय एक्ट 1867 जिलाधिकारी द्वारा सराय प्रबंधन से जुड़ा है. इसमें सराय की व्यवस्था की पूरी रिपोर्ट का पंजीकरण वगैरह भी शामिल है. जब प्रतियोगि​ताएं जुए की तरह होने लगीं तो 1955 में प्राइज कंपटीशन एक्ट 1955 बनाया गया, लेकिन अब उसकी प्रासंगिकता नहीं रह गई है.

द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारत आने वाले विदेशियों की निगरानी के लिए अंग्रेजों ने द रजिस्ट्रेशन ऑफ फॉरेनर्स एक्ट 1939 बनाया था. इसके तहत हर विदेशी नागरिक को 180 दिन से ज्यादा रहने पर पूरी जानकारी सरकार को दी जानी अनिवार्य थी. ऐसे कानूनों की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है.

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